Tuesday, December 2, 2014

प्रेशर पॉइंट

                                         प्रेशर पॉइंट 



 चमक-दमक और सस्ते  दाम मेरा भी जी ललचाया। 

सोंचा यह भी कर के देख लें, 

मैंने भी एक जोड़ी सस्ता जूता ले लिया। 

लोग-बाग़ मेरी  तारीफों के पूल बांधते रहे। 

मैं भी अपनी अकलमंदी पर मंद मंद मुस्कुराता रहा। 

पर यह क्या ? 
जूता क्या एक मुसीबत थी। 

कुछ  दिनों के बाद पाँव ज़मीन पर टिकने भी न पाते। 

एक -एक डग भरने में आँखों में आंसुओं  की लैला कैटरीना आ जाती। 

क़ुछ  दिनों में काया पलट हो गया 

लोग -बाग़ पूछने लगे।

यार आज -कल दिखाई नहीं देते  ?

मैं उनको कैसे बतलाऊं ?

कैसे  यह जतलाऊं ?

मन तो है पर कदम साथ नहीं दे रहे। 

उनके सामने  अपनी  बेबसी का रोना भी रो न सका। 

 थक हार कर डॉक्टर को दिखलाया। 

तफ़सील से सारी  फ़रियाद सुनाई। 

  डॉक्टर ने पूछा  कोई नया जूता ख़रीदा है क्या ?

मैं हैरान उनको  कैसे  यह पता चला ?

डॉक्टर भी मेरे इस सवाल पर मुस्कुराये ,

इसकी कोई दवा नहीं है। 

यह सुन मेरा कलेजा भी मुँह  को आया। 

बुझे चिराग सा मेरा चेहरा बुझने लगा।

 डॉक्टर ने पूछा दर्द से छुटकारा चाहते हो?

 मैंने  कहा
 इस दर्द से छूटकारा मिले तो  गंगा पार लगे। 

डॉक्टर ने कहा फ़ौरन नया जूता फ़ेंक दो

 और 

अपने पुराने जूते पर आ जाओ। 

तामीर की गयी,

 पुराने जूतों  में 

अपने  पैर फिर से घुसा दिए ।

 जूता  पुराना  ही था
 पर
  अपने पैरों पर खड़े होने का सुकून मुझे फिर से दे रहा है। 

अपने पराये के दरमियान  अपने ही विचार सुकून दे रहे हैं । 

राजेन्द्र कुमार …… 




Saturday, November 29, 2014

हमारा चुन्नू

चुन्नू आज भी मिटटी में खेलता है ,

कचरे से बीन सुखी रोटी चबाता है। 

चुन्नू की माँ आज भी उसे अकेला छोड़ पत्थर कूटती  है. चुन्नू आज भी धूल में सना
 
नंग- धडंग सर्दी धूप की चपेटों को सहता है। 

चुन्नू का बचपन आज भी झोपड़ियों में पनपता है।

 चुन्नू आज भी वाही चीर परिचित मुस्कान बिखेरता है।
 
चुन्नू आज भी पोस्टरों की शान बढ़ता है। 

चुन्नू आज भी रोता है ,

चुन्नू का वारिस आज भी पैदा किया जाता है। 

Friday, November 28, 2014

छिपकली

एक अजीब  गंध 
पसीने से सरोबार 
हाल के कोने कोने में 
रची बसी 
छत से डैनों जैसे 
पंखों की किरकिराटी 
आवाज़ ,
हवा में तैरती
इत्र की महक कभी कभार। 
रौशनी की दमक  में 
आस से खींचे चले आते
 कीट पतंगे।
 गोया  ज़िन्दगी  की 
आखरी छटपटाहट ,
 बेचैन गश्त
  कुर्सी के  आगे
 खड़े बेरौनक सहमे चेहरे।
 पर आस कीट पतंगों सी,
 मैं हर चेहरा सिर्फ पढता रहा.
 छिपकली बार -बार झांकती रही,
 कीटों पर झपट कर बार- बार खाती रही
 आहाट  पर
 दुबक जाती
 नेताओं के तस्वीरों के पीछे। 
मैं सिर्फ चेहरे  पढता रहा। … 

बिम्ब

हाँ 

मैं बिम्ब  तोड़ना चाहता हूँ। 

अर्जुन सा 

मछली  की आँख को 

भेदना  

चाहता हूँ। 

स्थावर  बरगद को ,

उस तुलसी  के बिरबे  को ,

गुलाब के  उस फूल को। 

मैं ज़िन्दगी के उस हर क्षण को,

एक नया  शब्द देना चाहता हूँ। 

जहाँ से नयी  अभिव्यक्ति का आरम्भ हो।