Tuesday, November 22, 2016

ज्ञान

                                             ज्ञान 

झोपड़ी  में बैठ 
जाना  आक्रोश क्या है ?
थकी बूढी आँखों  को देख 
जाना उम्मीद की हद(सीमा )क्या है?
बढ़ते नन्हे क़दमों से 
जाना प्रेरणा क्या है ?
जमीन पर बैठ कर जाना थकान क्या है। 
उठ कर जाना 
मेरी कूवत(सामर्थ्य)  क्या है ?


धरा पर चढे पैर। 
पैरों पर चढ़ा धड़। 
धड़ पर चढ़ा सर। 
नभ चढ़ा सर पर। 

बैठा भी रहा हूँ मैं

                                         बैठा भी रहा हूँ  मैं 

बैठा भी रहा हूँ मैं  
जैसे -
अपनों में अजनबी की तरह ,
फूलों में महक की तरह ,
हवा में खुशबू  की तरह,
बेवकूफों में बुद्धिजीवी की तरह ,
आसमान में बादल  की तरह ,
भाषण में नींद की तरह ,
रंगों में लाल की तरह ,
 बारूद  में आग की तरह। 

Saturday, November 5, 2016

क्रांति

                                                  क्रांति 



उनका 
चेहरा क्या ?
गरीबी की
 जियोग्राफी । 

गरम 
तपती
 चिलचिलाती
 धूप में 
लाल-लाल झंडियां लिए 
अक्सर 
उन्हें ऊँचे-ऊँचे 
रंग-बिरंगे
 झंडों की छाँव में
 ठहरे 
सुस्ताते 
देखा। 

                                           झंडा 


                                              





भूखे पेट 
नंगे बदन 
पिचके चेहरे 
हाथों में उनके 
लाल
पीले  
हरे 
नीले 
केसरिया 
सफ़ेद 
झंडे  
अफ़सोस नहीं है 
झंडों के चेहरे नंगे 
नंगे है वह चेहरे 
जिनके कंधों से  ऊँचे 
हमेशा रहते ये  झंडे  . 



Friday, November 4, 2016

bhook

                                                                 भूख 



मैंने उसे रोटी की भूख   से ज्यादा 
झूठी इज़्ज़त के लिए बिलबिलाते  देखा ।
उसे डर है कहीं किसी ने देख लिया तो ?
कितनी विकट स्थिति है ?
पेट की भूख पर 
है  दिमागी भूख हावी। 
इंसान भी अजीब है !
चमचमाते पुराने जूते में 
फटे मोज़े से ही अल मस्त है।  
                                                           बारिश पानी और हम 

लब लबाते सैलाब  को कभी 
बूंद बूंद  को तरसते देखा। 

नाले पोखर उसे 
फिर से आबाद कर रहे है। 
जब सूखा था  तब सैलाब 
निश्चिन्त था। 
सारे नाले पोखर से कटा हुआ था। 
सैलाब आश्वत था ,
उसका अस्तित्व सिर्फ सूखा है 
डटा रहा 
अडिग रहा 

बारिश की बून्द बून्द से उसका भी वजूद बढ़ता गया। 
यह क्या? 
तेज  धूप से फिर से वह सिमट गया 
गायब हुआ 
गोया बुद्धिजीवी। 
न प्यास बुझी। 
न परिंदे उड़े।  





                                                               समय गंध 


जहाँ मैं खड़ा हूँ 
वहां समय के गंध की संधास  भरी पड़ी है। 
क्या बताऊँ के ताजा समय  कैसा  है ?
ताजे जिस्म पर  सडा  दिमाग ,
सड़ी सोंच से सरोबार  हर आदमी,
इस समय को गंधाता है। 
सड़ी मुस्कान से  माहौल को  खुशनुमा  बनाने की नाकाम कोशिशों के बावजूद ,
हर चेहरे  दूसरे हर चेहरे  की नज़रों को तौलते  नज़र  आते है। 
समय के दुर्गन्ध। 
विकृत समय की स्थिति। 
खंडहर सा बिखरा 
एक सड़ा  समाज समय। 
                                                         बुद्धिजीवी कुकुरमुत्ता 



उग 
आया है 
यहाँ 
वहाँ 
खेत 
खलिहान 
चौपाल 
परिचर्चाओं 
में। 
हाथ लगते ही 
उसका  रंग उड़ने लगा 
चिपचिपाती सीलन सी 
बदबू  हाट में पसेर गया 
उठा उसे  फ़ेंक दिया 
फिर  उसी 
कचरे के ढेर में।