ज़मीन की छत पर
सदियों से
चमकता
पूर्णिमा का
चाँद.
बावली के
गहरे शांत
निशब्द
पानी की सतह पर
उसका प्रतिबिम्ब.
पाछी की
सरसराती
मदमाती
फुफकार.
मेरे जिस्म से
सरकते
ढीली मिटटी के
कण.
पानी की सतह पर
चन्द्रमा के
अक्स को
बिगाड़ते रहे.
मैं
मैं
निस्सहाय
बबूल
इसको
मूक देखता रहा..............
राजेन्द्र कुमार