Monday, October 11, 2010

शब्दों की  कवायद  से भटके ,

दो  एक शब्द .

 कविता  की   कतार में  खड़े .

 भावों को तहजीब देने का दावा

कागज़ पर स्याह से खिंची चंद  लकीरें .

आदमी  के वजूद से जुडी कुछ   बातें.

कविता सिर्फ भावों का  ? 

 अनुभवों का लेखा जोखा है ?

आंतर में भटके आदमी की सर्द भरी चीख है ?

 कविता न शब्दों  कि तड़क,

 भावों कि भड़क है .

 बिते हुए कल और आने वाले कल के साथ,

 इंसान के उम्मीदी  और नाउम्मीदी  का दस्तावेज है.

राजेंद्र कुमार

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