Monday, October 11, 2010

ट्रामों  बसों के शोर  में खोई  मेरी आवाज ,

कार्बन  मोनो-ऑक्सइड में 

घुली मेरी सांसे ,

 हेड लाईट  से बुझती  मेरी आँखें .
 कंक्रीट के जंगल में  खोया

मैं अब महज एक इंसान  नहीं रहा.

राजेन्द्र कुमार

1 comment: