Tuesday, October 12, 2010

KUEN SE JHANKTA CHAAND


ज़मीन की छत  पर

सदियों से

 चमकता

पूर्णिमा का

 चाँद.

  बावली के

गहरे शांत

 निशब्द 

पानी की सतह पर

 उसका प्रतिबिम्ब.

  पाछी की

 सरसराती

मदमाती

फुफकार.

 मेरे जिस्म से

 सरकते

  ढीली मिटटी के

कण.

 पानी की सतह पर

 चन्द्रमा के

अक्स को

बिगाड़ते  रहे.
मैं

निस्सहाय

 बबूल

 इसको

 मूक देखता रहा..............

राजेन्द्र कुमार

Monday, October 11, 2010

शब्दों की  कवायद  से भटके ,

दो  एक शब्द .

 कविता  की   कतार में  खड़े .

 भावों को तहजीब देने का दावा

कागज़ पर स्याह से खिंची चंद  लकीरें .

आदमी  के वजूद से जुडी कुछ   बातें.

कविता सिर्फ भावों का  ? 

 अनुभवों का लेखा जोखा है ?

आंतर में भटके आदमी की सर्द भरी चीख है ?

 कविता न शब्दों  कि तड़क,

 भावों कि भड़क है .

 बिते हुए कल और आने वाले कल के साथ,

 इंसान के उम्मीदी  और नाउम्मीदी  का दस्तावेज है.

राजेंद्र कुमार

ट्रामों  बसों के शोर  में खोई  मेरी आवाज ,

कार्बन  मोनो-ऑक्सइड में 

घुली मेरी सांसे ,

 हेड लाईट  से बुझती  मेरी आँखें .
 कंक्रीट के जंगल में  खोया

मैं अब महज एक इंसान  नहीं रहा.

राजेन्द्र कुमार

Thursday, September 30, 2010

दरबे में हाथ ने पकड़ा  उस एक को। 
 हल -चल मची  कुछ  क्षण के लिए। 
फिर चली छुरी उस एक पर।  
आर्त  स्वर में सहमे सभी। 
 चुप्पी सधी कुछ क्षण के लिए। 
फिर  लग गए सब दाना चुगने। 
 राजेन्द्र कुमार

Tuesday, September 28, 2010

है

अजीब

फितरत ,

टाट

के

पीछे

 नहाती

 को

टटोलती

नज़र .

राजेंद्र कुमार