Friday, November 4, 2016

                                                           बारिश पानी और हम 

लब लबाते सैलाब  को कभी 
बूंद बूंद  को तरसते देखा। 

नाले पोखर उसे 
फिर से आबाद कर रहे है। 
जब सूखा था  तब सैलाब 
निश्चिन्त था। 
सारे नाले पोखर से कटा हुआ था। 
सैलाब आश्वत था ,
उसका अस्तित्व सिर्फ सूखा है 
डटा रहा 
अडिग रहा 

बारिश की बून्द बून्द से उसका भी वजूद बढ़ता गया। 
यह क्या? 
तेज  धूप से फिर से वह सिमट गया 
गायब हुआ 
गोया बुद्धिजीवी। 
न प्यास बुझी। 
न परिंदे उड़े।  





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