Saturday, November 29, 2014

हमारा चुन्नू

चुन्नू आज भी मिटटी में खेलता है ,

कचरे से बीन सुखी रोटी चबाता है। 

चुन्नू की माँ आज भी उसे अकेला छोड़ पत्थर कूटती  है. चुन्नू आज भी धूल में सना
 
नंग- धडंग सर्दी धूप की चपेटों को सहता है। 

चुन्नू का बचपन आज भी झोपड़ियों में पनपता है।

 चुन्नू आज भी वाही चीर परिचित मुस्कान बिखेरता है।
 
चुन्नू आज भी पोस्टरों की शान बढ़ता है। 

चुन्नू आज भी रोता है ,

चुन्नू का वारिस आज भी पैदा किया जाता है। 

1 comment:

  1. बहुत दुखद है कि आज भी कई बच्चों का बचपन भूख, गरीबी और लाचारी की बलि चढ जाता है।

    ReplyDelete