हाँ
मैं बिम्ब तोड़ना चाहता हूँ।
अर्जुन सा
मछली की आँख को
भेदना
चाहता हूँ।
स्थावर बरगद को ,
उस तुलसी के बिरबे को ,
गुलाब के उस फूल को।
मैं ज़िन्दगी के उस हर क्षण को,
एक नया शब्द देना चाहता हूँ।
जहाँ से नयी अभिव्यक्ति का आरम्भ हो।
मैं बिम्ब तोड़ना चाहता हूँ।
अर्जुन सा
मछली की आँख को
भेदना
चाहता हूँ।
स्थावर बरगद को ,
उस तुलसी के बिरबे को ,
गुलाब के उस फूल को।
मैं ज़िन्दगी के उस हर क्षण को,
एक नया शब्द देना चाहता हूँ।
जहाँ से नयी अभिव्यक्ति का आरम्भ हो।
awaz e baaz
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